सोमवार, 11 अप्रैल 2016

बेज़ारी को बेपनाह प्यार में.......

बेज़ारी को बेपनाह प्यार में....... 
 
या खुदा इतनी तो कशिश भर दे दिल की दर-ओ-दीवार में
कि बदल के रख दूँ उसकी बेज़ारी(१) को बेपनाह प्यार में
कुछ यूँ माँगी है वक़्त की मोहलत मेरे राहग़ुज़र(२) अज़ीम(३) ने
काश फ़ौरन मुक़म्मल (४) हो ये न हो जनाज़ा उठे मेरा इंतज़ार में

कुछ माज़ी (५) की दुखती रगें हैं जिन्हे दबाना नहीं चाहता
कुछ उन लम्हों की चुभती यादों को भी बताना नहीं चाहता
मैं शायद कभी न भर पाऊँ उस खाली सी जगह का कोना
जिसे हसरतों सा पाले बैठा हूँ मैं अपने दिल-ए-दीदार में

कि बदल के रख दूँ उसकी बेज़ारी को बेपनाह प्यार में
क्यूँ इक ख़ौफ़ सा लगता है जब सुनता हूँ तेरा बीता कल
पूरी गुफ़्तगू में क्यूँ चुभ सा जाता है बस वही एक पल
या तो तुझे खो देने का डर सा है या ना-मालूम है वजह
मैं तो इस बात भी अंजान हूँ कि हूँ भी या नहीं तेरे इक़रार में

कि बदल के रख दूँ उसकी बेज़ारी को बेपनाह प्यार में

कोशिश बहुत की मैंने कि मुन्तज़िर (६) रहूँ और कुछ ना कहूं
दिल के कुछ जज़्बातों को ज़ाहिर किये बिना हँसता सा रहूँ
पर माफ़ करना शायद दिल हावी हो गया मेरे दिमाग़ के आगे
और कर बैठा हूँ इज़हार अपनी हालत का तेरे इख़्तियार(७) में

कि बदल के रख दूँ उसकी बेज़ारी को बेपनाह प्यार में

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उर्दू शब्दों का हिंदी अर्थ :
(१) अलग थलग सा (२) साथी (३) महान (४) पूरी (५) गुज़रा वक़्त
(६) इंतज़ार करने वाला (७) सामने


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बुधवार, 23 मार्च 2016

आपका शुकराना....

आपका शुकराना....

यूं  ही एक दिन उदास सा बैठा था मैं
ना जाने कहाँ से इक महकती ख़ुश्बू सी छू गयी
कुछ अजीब सी कशिश थी उसके एह्सासात की
जाते जाते बस छोड़ के वो अपना जुनूँ गयी......
कभी सोचा ना था उससे कुछ ऐसे जुड़ जाऊंगा
तन्हाइयों की राह पे चलता इक आवाज़ से मुड़ जाऊंगा
ना जाने क्या बात थी उसकी लरज़ती पलकों के चिलमन में
जो इक नज़र में तीरे-तश्तर चला के कुछ यूं गयी.......
चंद दिनों में ही वो लगने लगी ज़िन्दगी का हिस्सा सी
पलकें मूँद हज़ार मर्तबा पढ़ लूँ  वो किस्सा सी
मुझे दिल तो दे गयी वो अपना जाते जाते
पर मासूमियत में ले के मेरे दिल का सुकूँ गयी.......
लगने लगा है मुझे जीने की राह मिल गयी हो
मेरे बिखरे हुए ख़्वाबों को पनाह मिल गयी हो
खुदा गर दूर कर दिया जो मेरी जान से मुझे
गिला न करना मेरी रूह इबादत से बेज़ार क्यूँ गयी
गिला न करना मेरी रूह इबादत से बेज़ार क्यूँ गयी....

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2015

दूरियों के मौसम...

जाने हम किसी बात पे ज़रा मुस्कुरा क्या दिए
उन्हें लगा बगैर उनके सुकूँ से जी रहे हैं
बदनसीब हैं उन्हें बता भी नहीं सकते
हर लम्हा ज़हर के घूँट पी रहे हैं
उस एक वाहिद आखिरी मुलाक़ात में कहा था
फौत हो जाएंगे तुझ से दूर हो के हम
बदक़िस्मती से न ज़िंदगी मिली न वफ़ात
रूह के ज़ख्मों को क़तरा क़तरा सी रहे हैं
या तो मर जाते तेरे ग़म में या इंतज़ार करते
किसी एक बला को ही बस चुनना था
मरते तो तेरा दीदार सितारों से नोश करते
ज़िंदा हैं बस इसी तवक़्क़ो में जी रहे हैं
कोई ऐसी रात नहीं गुज़रती जिसमें तेरा सपना ना हो
कोई दिन नहीं गुज़रता जब तेरा एहसास अपना ना हो
इस मुस्कान के पीछे ज़ख्म जो अभी हरे से हैं
सुर्ख रखने को खुद को मेरा लहू पी रहे हैं
मरते दम तक तेरी राहों में पलकें बिछाए
धीमी आँच पर तेरी मोहब्बत की लौ जलाये
बस करूंगा तसव्वुर तेरी आहटों का ताउम्र
कभी दूरियों के मौसम एक से नहीं रहे हैं
कभी दूरियों के मौसम एक से नहीं रहे हैं!

मंगलवार, 16 सितंबर 2014

"इक क़सक जो अधूरी रह गयी" - मेरी १००वी रचना

तू साथ थी फिर भी तेरे हम-नवां(१) ना हो पाये
तुझ से दूर हुए फिर भी तुझसे जुदा ना हो पाये
हर वक़्त तुझे पलकें मूँदे किसी के सजदे में ग़ुम देखा
आखिर में मेरे गुमाँ(२) निकले पर तेरे ख़ुदा ना हो पाये
हज़ारों खतायें की होंगी तेरे जानिब(३) रह कर भी
बेइन्तेहाँ तग़ाफ़ुल(४) किये होंगे तुझे अपना कह के भी
ना जाने कितनी गिरहें(५) उलझ गयीं इन बीते लम्हों में
वक़्त गुज़ारते हैं इन्हे खोलने में पर बेवफा ना हो पाये
जब बिछड़ रहे थे तुझसे आँखों में नमी लिए
मुसल्सल(६) उम्मीद थी काश तुझे आग़ोश में ले पाएं
तुझ पे लिखे कुछ लफ्ज़ जो होटों पे लरज़ते रहे
अफ़सोस जुदा होते हुए भी वो ग़ज़ल ना कह पाये
खुदा मुझे या तो तुझे बख़्शे या करा दे मौत नसीब
बस एक बार दीदार हो और हम ये कह पाएं

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(१) अपनापन (२) धोखा (३) पास (४) तिरस्कार (५) गाँठें (६) सरासर

मंगलवार, 7 जनवरी 2014

अरमान अभी कुछ बाक़ी हैं!

क्या जी ली ज़िंदगी जी भर के
या उम्मीद नयी इक ताकी है
हर रोज़ सोच के जीता हूँ
अरमान अभी कुछ बाक़ी हैं
बचपन की यादें हुई गुम
वो यार जो बिछड़े राहों में
उन यारों से भी झगड़ों का
कुछ लेना देना बाक़ी है
जद्दो - जहद में ज़िन्दगी की
कुछ पल जो सुनहरे बिखर गए
उन पलों से खुद के पल चुन कर
शीशे में सजाना बाक़ी है
कभी इसके लिए कभी उसके लिए
अपनों के लिए दूजों के लिए
हर लम्हा दिल से  जीता हूँ
उम्मीद सी दिल में बंधती है
मेरा वक़्त भी आना बाक़ी है
सबके जीवन में खुशियों के
मुस्काते फूल खिलाता हूँ
शायद वो मिटटी होगी हरी
जिसका वो रंग तो खाकी है
हर रोज़ सोच के जीता हूँ
अरमान अभी कुछ बाक़ी हैं!

सोमवार, 5 अगस्त 2013

निशानियाँ

यूं तिनकों सी बिखरी हुई मेरी आराइश (१)
खूबसूरत रात की दास्ताँ कहती है
तेरे जाने के बाद भी पहरों तक
मेरे लबों पे इक जुम्बिश (२) रहती है
गेसुओं में तेरी उँगलियों की हरारत
 हर ज़ुल्फ़ उनछुई सिहरन सहती है
लरजती पलकों पे तेरे लबों की आहट
किसी शरारत की कहानी कहती है
तेरे आगोश में आकर टूट जाने की
उस वक़्त बस यही कोशिश रहती है
कि डूब जाऊं तुझ में  इस तरह से मैं
जैसे रेत दरिया के चश्मों संग बहती है
न जाने फिर कब आयेगा तू और
खूबसूरत सा वो मिलन होगा
कुछ तो छोड़ जाने की भी
दुनिया की रवायत (३) कहती है
चल कुछ और नहीं तो बस तू फिर
लबों पे गवाही छोड़ जाना
सुना है कि कुछ ख़ास गवाहियां
बन के निशानियाँ रहती हैं

शब्दार्थ : (१) साज-सज्जा (२) एह्साह (३) रस्म

मंगलवार, 2 जुलाई 2013

कुछ अनछुए पहलू!

तन्हाइयों में घिरा कुछ सुकून की तलाश में
सोचा इक खामोश सा कमरा ढूंढ लूं मकान में
खुशकिस्मती से इक कोठरी मिली जिसे खोला तो देखा
उसमें मेरे बचपन का हर लम्हा बिखरा हुआ है
ये लम्हे अब मेरी तन्हाइयों के हमसफ़र हैं
जिन्हें ना जाने कब से किस किस हवा ने छुआ है
जब समेटने लगा मेरी लिखी कुछ नज्मों की परतें
पाया हर एक पुलिंदा दूसरे से चिपका सा हुआ है
मानो कह रहा हो जुदाई के डर  से वो मुझ से
ना कर अलग साँसों का रिश्ता जुड़ा हुआ है
सोचा था ये पन्ने मेरी हाजत-रवाई(१) करेंगे
पर इन्होने तो वादा-ए-वफाई किया हुआ है
काश हम भी इन पुराने कतरों नुमाँ (२) होते
जो रवायत (३) समझ खुदा ना बनाते बनाते खुद को
अफ़सोस बड़ी देर लगी ये हकीकत समझने में
की क्या खुदा भी कभी किसी एक का हुआ है

शब्दार्थ : (१) एक दूसरे को समझना (२) की तरह (३) परंपरा

गुरुवार, 6 जून 2013

न जाने क्यों!

क्या अजीब से हालात हैं कि वक़्त नहीं कटता 
निगाहों के सामने से तेरा चेहरा नहीं हटता 
लगता है जैसे ज़माना हुआ तुझे देखे हुए मुझको
यूं बे-वजह ही दिल से गुबार-ए-ग़म नहीं फटता 
हैरान हूँ उन कसमों के मयस्सर होने की नीयत पे 
जो कहती थी तुझे देखे बिना ये दिल नहीं धडकता 
बातें थी शायद बस तेरी बातें ही होंगी वो 
बातों में अब वो पहले सा जुनूँ  नहीं दिखता 
वक़्त है ये वक़्त जो हर शै से है जबर 
इस वक़्त के आगे कोई वादा नहीं टिकता 
काश तू देख पाती चाक-ए-जिगर मेरे 
ना जाने कितने कतरे बहे खूं  नहीं रुकता 
शायद तुझे लगता है ये की बस बहाने हैं 
और मैं तुझे कभी कहीं समझ नहीं सकता 
तू बेखबर है हालत से मेरी जा ओ बेवफा 
सासें हवा सी ले रहा हूँ जी नहीं सकता 
तेरी नज़र में खो चुका हूँ काबिलियत इस क़दर 
बदनसीबी है की अब तुझे हासिल हो नहीं सकता

मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012

ज़िंदगी से इक मुलाक़ात !

ये गुस्ताखियाँ हैं तेरी जुल्फों में क़ैद ओस की बूदों की
जिनके महासल(1) बने दरिया ने मुझे इक नज़्म लिखा दी 
तेरे सजदे में ग़ुम हो के जो पलकें मूंदी मैंने 
उस एहसास ने ही मुझे नफीस(2) जन्नत दिखा दी 
गेज़ाल(3) सी तेरी आँखों की शोखी ने यकायक 
ख़्वाबों से जगा साकी बिन मुझे मय सी पिला दी 
तेरे आँचल की इक लहर जो वीरानो से निकली थी कभी 
ना जाने कितनी उस ने क़ब्रों में सोयी रूहें ज़िला दीं 
तेरे क़दमों की आहट जैसे खनकते घुंघरुओं ने 
बाखुदा सहराओं(4) में भी मस्त इक महफ़िल खिला दी 
इल्तेजा है खुदा से तेरी नज़र-ए-इनायत हो मुझ पे 
यूं लगेगा मुझे के खुदा ने ज़िंदगी मिला दी!

(1) परिणाम स्वरुप (2) जगमगाती (3) हिरनी जैसी (4) रेगिस्तान 

सोमवार, 7 मई 2012

जय हो निर्मल बाबा!


दोस्तों
सब को मेरा प्यार भरा प्रणाम!
जैसा की आप सब जानते हैं की मेरे घर में नन्ही परी ने जन्म लिया है तो आजकल इतना व्यस्त रहता हूँ की ब्लॉग पर आने का वक़्त ही नहीं मिलता, काफी दिनों से आप सभी को नहीं पढ़ पाया इसके लिए क्षमा याचक हूँ!  आज ज़रा वक़्त मिला तो सोचा की कुछ लिखा जाए और निर्मल बाबा से बढ़िया क्या मिल सकता था तो एक व्यंग लिख डाला!
कृप्या ध्यान दें: ये एक कल्पना मात्र है, किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का मेरा इरादा नहीं है!

आशा करता हूँ आप सब को पसंद आयेगी ये रचना!

सुरेन्द्र "मुल्हिद"

जय हो निर्मल बाबा!

आजकल कोई कहता नहीं, जाना है काशी काबा
पूरी दुनिया पे छाये हैं अपने निर्मल बाबा 
किसी को कहते बिस्किट खाओ किसी को कहते खीर
भर भर के किरपा आयेगी, बन जाओगे पीर
किसी ने घर का खाना छोड़, पकड़ लिया है ढाबा
पूरी दुनिया पे छाये हैं अपने निर्मल बाबा   
हरे गुलाबी छोड़ के बस तुम बटुआ रखना काला
अब तक घर में क्यों नहीं तूने काला कुत्ता पाला
पैसे गर पाने हों बच्चा, शिफ्ट तू हो जा नाभा
पूरी दुनिया पे छाये हैं अपने निर्मल बाबा 
कोई कहता जुड़े हुए बस हुए हैं ६ ही महीने 
दरबार के चक्कर लगा लगा छूट गए पसीने
गर्लफ्रेंड नहीं बनी तो बेटा चला जा बीच कोलाबा
पूरी दुनिया पे छाये हैं अपने निर्मल बाबा 
अपने घर सुख मिले नहीं तो दूजे के घर झाँक
फिर भी अगर दिखाई ना दे, खोल ले तीसरी आँख
सब सोना दरबार को दे के, घर में रख ले ताम्बा 
पूरी दुनिया पे छाये हैं अपने निर्मल बाबा 
पूरा होते काम तुझे देना होगा दस्वंद 
वरना मेरे पहलवान तेरी साँसें करेंगे बंद
बेवक़ूफ़ जनता को बनाना, यही है मेरा हिसाबा
पूरी दुनिया पे छाये हैं अपने निर्मल बाबा 
जय हो निर्मल बाबा की, जय हो निर्मल बाबा!

सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

गाहे-बगाहे हैं!

चलते चलते इतनी दूर चला आया मैं


फिर भी लगती अजनबी सी राहें हैं

लाख नज़ारे देखे होंगे राह-ए-सफ़र में

ना जाने क्यों फिर भी सूनी सी निगाहें हैं

यूं तो तेरी यादों को साथ ले के चला था

अब गहराइयों में दिल की सिसकती सी आहें हैं

तुझे आगोश में लेने की बस तम्मना रह गयी

आज भी तेरे इंतज़ार में खुली मेरी बाहें हैं

ना जाने कब फरिश्तों की नगरी से बुलावा हो

सुना था वहाँ रहती मोहब्बत-ए-पाक अरवाहें हैं

इक तुझसे प्यार किया तो पहचान थी अपनी

आज दुनिया की नज़रों में हम गाहे-बगाहे हैं!

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

"मफर सी रिहाइश"

ना जाने क्यों वो मुझ से दूर हैं
इक पल उनके बिना बिताया नहीं जाता
उनकी यादें ही अब साँसों की कासिम(१) हैं
वर्ना रिश्ता-ए-ज़िंदगी निभाया नहीं जाता
उनकी गलियों में मफर(२) सी रिहाइश में हैं
हू-ब-हू उनसा कोई साया नहीं आता
रात होते चाँद में नज़र गड़ सी जाती है
जाने क्यों उनका रुखसार नुमाया(३) नहीं जाता
हार कर क़दम मयखाने मोड़ लेते हैं
वहाँ भी गम-ओ-मय मिलाया नहीं जाता
हर रोज़ उनके लिखे कागज़ के कतरों में
चाह कर भी खुद को गुमाया नहीं जाता
हर लफ्ज़ उनका जीने की उम्मीद सा है
हज़ारों बार पढ़ लूं कुछ मेरा जाया नहीं जाता !!

(१) बांटने वाली (२) खानाबदोश (३) प्रतीत होना

मंगलवार, 11 अक्टूबर 2011

मुश्क-ए-जज़्बात

उन्होंने चेहरे पे जुल्फें यूं बिखरायीं


जैसे सावन की गर्त काली रात हुई हो

नूर-ए-चश्म झांकता सा गेसुओं के चिलमन से

जैसे सुर्ख बादलों से उसकी बात हुई हो

इक पल को ही जो उनके दीदार हो जाएँ

लगे ज़िन्दगी की मुकम्मल सौगात हुई हो

जो झटक दें जुल्फों से पानी के कुछ कतरे

यूं लगे रिमझिम मुहब्बत की बरसात हुई हो

नज़र उठा के देख लें जो वो झरोखों से

क़दमों में जैसे झुकी झुकी कायनात हुई हो

उनके रुखसार की रौशनी से ही उजाला है

जो ढक ले कभी तो दिन में मानो रात हुई हो

खुदा ने भी शायद उन्हें शिद्दत से तराशा है

मानो सबसे काबिल शिल्पी से उसकी बात हुई हो

गुरुवार, 8 सितंबर 2011

कुछ ग़ुम अनमोल लम्हे......

ना जाने किस धुन में था मैं उस दिन
आग-ए-गुमाँ रिश्तों को तपाया मैंने
बदकिस्मती में खाली हाथ बैठा था
एहसास का वो अज़ीज़ पल गवाया मैंने
वो जिन्हें मोतियों की माला बना सजाना था
उनकी आँखों से उन अश्कों को बहाया मैंने
वो नाराज़ हो के भी तलाशते रहे मुझको
बे-गैरती में कोई रिश्ता न निभाया मैंने
रुखसती का हर लम्हा उन्हें सालता सा था
उन्हें और जलाने खुद को छुपाया मैंने
कुछ वक़त बाद एहसास हुआ दीदा-दिलेरी(१) का
दस्त-बसता(२) फ़रियाद दिल को मनाया मैंने
इक डर सा दिल में था की वो माफ़ न करे
पर हिम्मत कर उसकी तरफ क़दम बढ़ाया मैंने
अपनी तरफ आता देख वो उठ के जाने लगे ऐसे
अपनी आँखों में खुद को गिरा नुमाया मैंने
पलकें झुकी और खुद में जैसे ही सिमटा
उन्हें अपने ही करीब खडा पाया मैंने
अब फर्क ये था अश्क थे दोनों की आँखों में
अश्कों के दरिया में खुद को डूबा पाया मैंने
इक बार फिर साबित हुआ वो कितना चाहते हैं
खुद को उन सा बनाने का वादा खुद से बनाया मैंने
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(१) शर्मनाक हरकत (२) हाथ जोड़ कर
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रविवार, 17 जुलाई 2011

एहसास..........

चन्द रोज पहले उन से मुलाकात ने
कुछ ऐसा निशान दिल पे छोड़ दिया
यूँ लगा बिस्मिल्ला कर इलाही ने
दो अरवाहों(१) को इक दूजे से जोड़ दिया
वो मुझ में और मैं उन में
कुछ इस कदर से गुम थे हो गए
बस आगोशी की खुश्बू इन्तिशार(२) हुई
और शर्म-ओ-हया का चिलमन तोड़ दिया
क़रीबियत का एहसास रश्क-ए-जिनान(३) सा था
यकायक खुद को तेरी बाहों में तोड़ दिया
निकला था घर से खुदा की बन्दगी करने
मोहब्बत के फरिश्तों ने तेरी ग़ली मोड़ दिया
तू दूर है मुझसे फिर भी सांसों में रिहाइश है
तेरी तपिश के सिवा ना खुद को कुछ और दिया
यादों की नीव पे तामीर(४) ख्वाबों का घरौन्दा
आज मिल गया और महलों को मैने छोड़ दिया
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(१) आत्माओं (२) फैलना (३) जन्नत जैसा (४) खडा किया हुआ
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बुधवार, 18 मई 2011

किसी ख़ास के लिए....

तू मेरी चाहत का यूं ही इम्तेहान न ले ओ ज़ालिम
तेरे दिल में समंदर सा प्यार न भर दूं तो कहना
कुछ ऐसा कर दूंगा की आकिबत(१) में तू ढूंढे मुझे
बाहों में टूटने को मजबूर न कर दूं तो कहना
ये जो सज संवर के निकलते हो दिखावटी चिलमन ओढ़े
इसे फ़ाज़िल(२) निगाहों से तार-तार न कर दूं तो कहना
अभी तो तुझ से रू-ब-रू ही करता रहता हूँ मैं
इक दिन इज्तेमा-ए-महफ़िल(३) इज़हार न कर दूं तो कहना
तेरी हर ख्वाहिश को पूरा करने की कोशिश में
दिखता तो जो बस एक है, वो चाँद चार न कर दूं तो कहना
तू तो बस मुझे वो नादिर(४) मुहब्बत के दो फूल दे दे
उन्ही दो फूलों से दामन गुलज़ार न कर दूं तो कहना
जो तू साथ न छोड़े ता-उम्र मेरा ए मुश्फिक(५)
मौत के फ़रिश्ते को भी इनकार न कर दूं तो कहना
इतनी कशिश है मेरी मुहब्बत की तासीर में
दूर हो के भी तुझ पे असर न कर दूं तो कहना!

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(१) पुनर्जन्म (२) तेज़, शातिर (३) हजारों लोगो की भीड़ (४) खूबसूरत (५) दोस्त
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सोमवार, 25 अप्रैल 2011

अनमोल कर दिया!

प्रिय मित्रो,
सादर नमस्कार!
आज लगभग डेढ़ महीने बाद कुछ लिखने का मौका मिला, असल में इतना व्यस्त था की अपने आप को भी वक़्त नहीं दे पा रहा था!
पेश-ए-खिदमत है आप सब के आशीर्वाद को व्याकुल मेरी एक नयी रचना, आशा करता हूँ आपको पसंद आएगी!

मुझे याद है वो दिन जब पत्थर था मैं
और कोई राहगीर मुझे खरीदता नहीं था
जी रहा था मुफलिसी की ज़िन्दगी पल पल घटती
किसी रहबर का दिल भी कभी पसीजता नहीं था
हर रोज़ शाम दरख्तों की आड़ में छुप कर
हस्सास(१) निगाहों से तुझे निहारा करता था
तेरी इक नज़र की कशिश की महक को ही
अपने दिल की गहराइयों में उतारा करता था
फज़ल से वो पल भी आया उस दिन ज़िन्दगी में
तुने छुआ मुझे हलके से और फिर बात की
ऐसा लगा किसी हूर ने छड़ी घुमाई और
अमावस सी ज़िन्दगी में पूनम की रात की
तेरे होटों की छुअन ने तो जैसे
कडवे ज़हर भी शीरे का घोल कर दिया
मैं मिटटी का ज़र्रा था बेकार तूने
खरीद कर मुझे लिल्ला अनमोल कर दिया
बस आखिरी सफ़र भी अब आशिकाना हो जाए
तेरी मेरी कहानी इश्क का अफसाना हो जाए
सांस टूटे तो टूटे तेरी बाहों की आगोश में
खुदाया मौत भी मेरी फिर शायराना हो जाए

(१) भावुक

शुक्रिया!

मंगलवार, 8 मार्च 2011

औरत हूँ मैं....

प्रिय मित्रो,
सादर प्रणाम, पहले तो आज नारी दिवस के मौके पे मेरे सभी महिला ब्लॉगर सहभागी मित्रों को विशेष सत्कार!
काफी दिन हो गए थे, व्यस्तता के कारण कुछ लिखने का वक़्त ही नहीं मिल पा रहा था, आज ज़रा फ्री हुआ तो सोचा की मौका भी अच है, दिन भी अच्छा है तो क्यों न नारी के अस्तित्व पे कुछ लिखने की गुस्ताखी कर लूं, सो लिख दिए दिल के भाव!
आशा करता हूँ आप सभी अपने आशीर्वाद से अभिभूत करेंगे!

शीर्षक है: "औरत हूँ मैं...."


औरत हूँ मैं....

पैदा हुई तो किसी के यहाँ दिवाली,
और किसी के यहाँ रात काली,
कहीं सवालों के जवाब बनी,
और कभी खुद ही बन गयी सवाली,

औरत हूँ मैं....


कभी दो बहनों के होते भी मिला प्यार,
कभी अकेली थी भाइयों में तो भी तिरस्कार,
कभी मिल गया सब कुछ बिन मांगे ही,
कभी खुद पे भी न जता पायी अधिकार,
 
औरत हूँ मैं....


कभी पढ़ लिख के ऊंची मंजिल पायी,
कभी चूल्हों चौकों से न निकल पायी,
जहां कष्ट हज़ारों झेले थे कभी,
ज़रा सुख मिला तो भी न निगल पायी,
 
औरत हूँ मैं....


कभी माँ बाप को दोस्त समझ सब कह गयी,
कभी डरती सहमती सी चुप रह गयी,
कभी हसरतें उम्मीदें पूरी हुईं,
कभी बिन बोले ही सब कुछ सह गयी,
 
औरत हूँ मैं....


कभी कल्पना बन चाँद पे जा बैठी,
कभी बर्तन धोते तश्तरी को चाँद बना बैठी,
कभी सपनो ने अरमानो के पंख लगाए,
कभी दबे हुए अरमान भी भुला बैठी,
 
औरत हूँ मैं....


बेटी, बहन और माँ भी मैं हूँ,
तपती धूप में ठंडी छाँ भी मैं हूँ,
अत्याचारों की आग में जलती जो है,
जहाँ रहते हो वो भारत माँ भी मैं हूँ,
 
औरत हूँ मैं....


हर रूप में ममता की मूरत हूँ मैं,
जग जननी सृष्टि की ज़रुरत हूँ मैं,
दो क़दम आओ तो चार क़दम मैं आऊँ,
रब के बाद रब की ही सूरत हूँ मैं,
 
औरत हूँ मैं....औरत हूँ मैं....औरत हूँ मैं....!

शुक्रवार, 21 जनवरी 2011

अँधेरे का एहसास न हो!

अभी कुछ दिन ही हुए तुम दूर गए,

लगता है अरसो से तुम पास नहीं हो,

गाहे-बगाहे सासें भी रुक रुक के आती हैं,

जैसे इन्हें भी तेरी साँसों बिना जीने की आस नहीं हो,

तुझ पे लिखी हुई बंदिशों का पुलिंदा उठाया,

सोचा पढ़ लूं तो दूरियों का एहसास नहीं हो,

ज़ालिम हर लफ्ज़ की तासीर ने यूं घायल किया,

जैसे उन्हें मेरी तन्हाईयों का एहसास नहीं हो,

कुछ और पन्ने पलटे तो इक सूखा गुलाब दिखा,

फिर याद आया अरे ये तो वही पहला गुलाब है,

जो डर डर के तुम्हें देने को तुम्हारी सहेली को दिया था,

दूर झरोखे से तुम्हें यूं देख रहा था जैसे,

नज़रें उठाने की भी हिम्मत पास नहीं हो,

तुमने फूल लिया और मैं दौड़ कर ऊपर के कमरे में गया,

छोटे से मंदिर में घी का दिया जलाते हुए,

रब को हाथ बांधे शुक्रिया करते हुए कहा,

भले ही मिलाना हज़ारों से पर ध्यान ये रखना,

के कोई तुम जैसा खासम-ख़ास नहीं हो,

खुशकिस्मती है आप ज़िन्दगी का हिस्सा हैं,

जो कभी भी ख़त्म न हो ऐसा एक किस्सा हैं,

इंतज़ार में हूँ तुम जल्द आओ और अपने रुखसार से,

कुछ यूं रौशन करो की गर्त में भी अँधेरे का एहसास नहीं हो!

बुधवार, 12 जनवरी 2011

केश सिक्खां लई सब तों वड्डी दात!

कल शाम मैं गुरबाणी विचार सुन रहा था तो सिख पंथ के महान कथा-वाचक भाई पिंदरपाल सिंह जी ने एक कथा सुनाई! यह कथा जो आजकल केशों(बालों) की बे-अदबी कर रहे हैं सिख भाई, उनके लिए प्रेरणा है! मैं पूरा तो नहीं सुन पाया लेकिन जो सुना वही आप सभी के सन्मुख रख रहा हूँ!

गुरु गोबिंद सिंह जी जब औरंगजेब के खिलाफ लड़ाई कर रहे थे तो एक मुस्लिम जिसका नाम बुद्धू शाह था औरंगजेब का साथ छोड़ के गुरु साहिब के साथ मिल गया क्योंकि उसके मुताबिक़ गुरूजी सच की लड़ाई लड़ रहे थे, एक एक कर के दोनों ओर से लोग शहीद हो रहे थे और इस भाई बुद्धू शाह ने अपने दोनों जवान बेटों को भी लड़ाई के लिए गुरु जी के सुपुर्द कर दिया! लड़ाई में बुद्धू शाह के दोनों बेटे भी शहीद हो गए, जब ये बात गुरु जी को पता चली तो उनका दिल भर आया और उन्होंने बुद्धू शाह के पास जा के कहा, "बुद्धू शाह, आज तेरे दोनों बेटों ने सच के लिए कुर्बानी दी है, मांग आज तो तुझे माँगना है", उस वक़्त गुरु गोबिंद सिंह जी अपने केशों में कंघा कर रहे थे, तो बुद्धू शाह ने कहा की आपको अगर इतना ही तरस आया है मुझ गरीब पे तो आप मुझे अपना कंघा और उस में लगे हुए केश दान कर दो, इतना सुनते ही गुरु गोबिंद सिंह जी ने, कंघे समेत केश, बुद्धू शाह की झोली में डाल दिए!

जब बुद्धू शाह घर आया तो उसकी बेगम नसरीन ने पूछा की मेरे बेटे कहाँ हैं, इस पर बुद्धू शाह ने जो जवाब दिया वो उन सभी सिक्खों के लिए एक सबक है जो अपने केश कटाते हैं और अपने आप को गुरु का सिख कहलवाते हैं!

बुद्धू शाह ने कहा, "नसरीन, मैं अपनी ज़िन्दगी के सब से बड़ी कमाई, सब से बड़ी कीमती चीज़ अपने बेटे, गुरु गोबिंद सिंह को सौंप आया हूँ, और गुरु गोबिंद सिंह की सब से कीमती चीज़, उनके केश, अपने साथ ले आया हूँ"

इतना प्रेम करते थे गुरु गोबिंद सिंह जी अपनी सिक्खी से, और आज न जाने क्या हो गया है, फैशन के चक्करों में पड़ कर सिख अपने केशो की बे-अदबी करने से भी नहीं चूकते! गुरु गोबिंद सिंह जी ने सिक्खी के लिए अपने चारों बेटे कुर्बान कर दिए और आज हम उनकी दी हुई सिक्खी को ही नहीं संभाल पा रहे हैं!

वाहेगुरु हम सब पापियों को सद-बुद्धि दें!

वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फ़तेह!