शनिवार, 21 नवंबर 2009

फरमाइश की है...

आज तुझे अपना बनाने की ख्वाहिश की है,
तेरा आबिद बन के तुझ से गुजारिश की है,
सजदे में तेरे ख़ाक हुए उसी दिन से,
जब से आफ़ताब-ऐ-नूर नुमाइश की है,
हाजत-मंद तेरे हुस्न का बाशिंदा हूँ,
फुर्सत में इलाही ने तराइश की है,
इन ताबदार गेसुओं में पनाही दे दे,
मेरी तरफ़ से जिन्होंने ये शिकायत की है,
जाम-ऐ-गाफिर नज़र भर देख ले मुझको,
बड़े माहरम से तुझ से फरमाइश की है,
बड़े माहरम से तुझ से फरमाइश की है!

9 टिप्‍पणियां:

  1. नख-शिख का वर्णन करती हुई,
    इस खूबसूरत गजल के लिए बधाई!

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  2. Waaah! aapke andaz-ae-bayan to bha gaya hamko....ek guzarish hai urdu words ka meaning bhi likh diya karein......aabida ka matlab kya hot hai ?

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  3. वाह वाह फरमाईश बहुत बडिया है हम भी आशीर्वाद दे देते हैं शायद हमारी दुया कासर हो जाये बहुत सुन्द। आशीर्वाद्

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  4. "आज तुझे अपना बनाने की ख्वाहिश की है,
    तेरा आबिद बन के तुझ से गुजारिश की है..." Very well begun indeed!
    The main attraction of the poem lies in the rhythm contained in the lines that present deep thoughts. The beauty of Urdu language adds to the charm of the poem.

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  5. बहुत ही सुंदर शब्दों का प्रयोग करके आपने उम्दा रचना लिखा है जो काबिले तारीफ है ! बहुत खूब!

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  6. बहुत बढ़िया फरमाइश की है आपने सुन्दर लिखा है शुक्रिया

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