शनिवार, 26 दिसंबर 2009

उन्सियत!!

अरसे से इक बात दिल में रक्खी है,

चाह कर भी असबाब(१) बयाँ नहीं होता,

तन्हाई में बस दिन रात बसर होते हैं,

दफ्न जज्बातों में खूं रवां नहीं होता,

रिन्दों(२) के दरमियाँ शाम गुज़रती है,

महफ़िल में रह के भी वक़्त जवाँ नहीं होता,

मयकश पूछते किस मुअम्मा(३) में गुम हूँ,

तेरे ख़्वाबों में डूब के भी हल नुमाँ(४) नहीं होता,

फरोमाया(५) ही इस दुनिया से चला जाऊंगा,

काश एहसास-ए-उन्सियत(६) न किया होता!

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(१) कारण (२) पियक्कड़ (३) पहेली (४) प्रतीत (५) बेकार या किसी काम का नहीं (६) लगाव

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9 टिप्‍पणियां:

  1. अरसे से इक बात दिल में रक्खी है,
    चाह कर भी असबाब बयाँ नहीं होता,

    बहुत खूब...!
    बहहुत प्यारी गजल पेश की है आपने!

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  2. बहुत सुन्दर कल दोबारा आती हूँ । अभी कई बार पड्जूँगी

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  3. I suppose our lives revolve around the word 'काश';
    काश ऐसा होता, काश वैसा होता!
    So we never really get out of it no matter how hard we try. Alas! we don't have any undo or redo button in life. So it is only dreams that we have..and I say again.."काश ऐसा होता, काश वैसा होता!" That's all we can say finally.
    Thanks for another of your wonderful creation.

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  4. achchhi gazal likhi hai apne...likhte rahiye naye saal me aur jayada padne ka mauka dena

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  5. Surendra! ek baar fir lajawaab kar diya aapne..
    fantastic lyrics.Wishing you very happy coming new year.

    regards,
    Priya

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  6. महफ़िल में रह के भी वक़्त जवाँ नहीं होता,
    मयकश पूछते किस मुअम्मा में गुम हूँ,
    bahut acha likha hai !!
    bahut khubsurati ke sath words use kiye hain composition main.

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  7. बहुत खूब
    बेहतरीन रचना
    बहुत बहुत आभार
    एवं नव वर्ष की हार्दिक शुभ कामनाएं

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  8. बढ़िया गज़ल बधाई।
    --नववर्ष मंगलमय हो।

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  9. फरोमाया(५) ही इस दुनिया से चला जाऊंगा,
    काश एहसास-ए-उन्सियत(६) न किया होता!

    Likhte to aap hamesha hi achha hai par har baar baat kehne ka aapka andaaz aur bhi khoob hota ja raha hai.. bahut hi achha likha hai..


    naye saal ki bahut bahut badhaaeeyaan

    -Sheena

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