बुधवार, 17 फ़रवरी 2010

रकीब हो जाते हैं!


कृप्या तस्वीर पर क्लिक करें!

धन्यवाद!

16 टिप्‍पणियां:

  1. हम लोग जो दौलत के समंदर में डूबे हैं,
    अपनों की कशिश दूर हो, गरीब हो जाते

    बहुत खूब...वाह...क्या बात कही है...लाजवाब.
    नीरज

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  2. sacchi baat kahi hai aapne..
    बुरा वक़्त आ तो जाए, रकीब हो जाते हैं!

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  3. हम लोग जो दौलत के समंदर में डूबे हैं,
    अपनों की कशिश दूर हो, गरीब हो जाते

    जिनसे हर हाल में करीबियत का यकीं हो,
    बुरा वक़्त आ तो जाए, रकीब हो जाते हैं!

    bahut hi khoobsurat sher
    duniya ka darpan .....

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  4. वो रिश्ते इक पल में अजीब हो जाते हैं,
    कसमें खाते थे जिनकी वफ़ा-ए-मुहब्बत की,
    हम लोग जो दौलत के समंदर में डूबे हैं,
    अपनों की कशिश दूर हो, गरीब हो जाते
    बहुत खूब सूरत गज़ल है । बधाइ और शुभकामनायें

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  5. जो पंक्ति को बहुमत मिला। मैं उस पंक्ति के साथ आया।

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  6. बहुत बढ़िया गजल!

    गजल लिखने में आपको महारत है!

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  7. Very well said!
    "फ़ासले ही हैं जो करीब हो जाते हैं" -- beautiful thought indeed...
    We really give more importance to the wealth and our worldly goods than to emotions and relationships.
    thanks for sharing such wonderful creation of yours.

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  8. सच्चाई बयां करती ग़ज़ल...बहुत खूब

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  9. हम लोग जो दौलत के समंदर में डूबे हैं,
    अपनों की कशिश दूर हो, गरीब हो जाते

    kya bat hai....apno ka sath chhut jaye to sab chhut jata hai rab ruth jata hai

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  10. बढ़िया रचना के लिए
    आभार ..................

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  11. आपने कमाल का ग़ज़ल लिखा है और मैं तो निशब्द हो गयी! जितनी भी तारीफ की जाए आपकी उतना ही कम है!

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  12. Hello,

    So close to reality...
    You are doing good job and this art of writing will take you one level up with every creation everytime :)

    Regards,
    Dimple

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