गुरुवार, 6 अगस्त 2009

दर्द!

जमात में मेरे मरने पर रोने वालो की कमी नही थी,
दफ़नाने मेरी मिटटी को किस्मत में दो गज ज़मी नही थी,
हलकी हलकी सी नमी तो बदन को महसूस हुई लेकिन,
मेरे जाने की खुशबु ऐ गम अभी पूरी तरह रमी नही थी,
शायद तेरे इंतज़ार में जो अश्को के दरिया बहाए,
मर के भी रफ़्तार उनकी दिल में मेरे थमी नही थी,
गर इक बार तू जनाजे पे नज़र-ऐ-इनायत कर देती,
ख्वाहिश पूरी हो जाती जो बर्फ नुमा जमी नही थी,
बस अब चलते हैं सफर पूरा कर के इस दुनिया का,
धुंधली हो गयी आरजूएं जो शायद कभी घनी नही थी!

16 टिप्‍पणियां:

  1. mar ke bhi raftar unki dil main mere thami nhn thi...
    dhundli ho gaye aarjuyn jo shayad kabhi ghani nhn thin...
    bahut marmik panktiyan hain...
    A touching composition...

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  2. Waah!
    'Ek dariyaa chala dard kaa,
    Saath ho liye kuchh jharne,
    karwayen dard badhta gaya,
    Aage chal samandar me kho gaya..'

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  3. dard ko poori tarah ubhar diya hai...........bahut hi gahri kashish hai rachna mein.........bahut gahre bhav hain.........shandar

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  4. हलकी हलकी सी नमी तो बदन को महसूस हुई लेकिन,
    मेरे जाने की खुशबु ऐ गम अभी पूरी तरह रमी नही थी,
    dil se likhi ahsaso se bhari ek khoobsurat nazam...

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  5. Thanks for coming on my blog and appreciating.
    Please note down my email id:

    rural.om@gmail.com
    omji.arya@gmail.com

    In previous comment I forgot to give the id. thanks

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  6. dard ko bayan kiya hai ....khoobsoorat hai...wakai difficult task!

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  7. जमात में मेरे मरने पर रोने वालो की कमी नही थी,
    दफ़नाने मेरी मिटटी को किस्मत में दो गज ज़मी नही थी,

    वाह.....!!!

    हलकी हलकी सी नमी तो बदन को महसूस हुई लेकिन,
    मेरे जाने की खुशबु ऐ गम अभी पूरी तरह रमी नही थी,

    बहुत खूब....!!!!!

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  8. वाकई में आपने बड़े ही सुंदर रूप से दर्द को बयान किया है! लाजवाब रचना! काश की दुनिया में कभी किसीको दर्द नहीं मिलता सिर्फ़ खुशियाँ ही खुशियाँ मिलती !

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  9. I thnk this creation is superb..

    ismein sabhi emotions ko bahut hi
    aasani se present kiya hai!!

    Likhte rahiye.. :)

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  10. धुंधली हो गयी आरजूएं जो शायद कभी घनी नही थी!

    Nicely written! Great job.

    Regards,
    Dimple
    http://poemshub.blogspot.com

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  11. बस अब चलते हैं सफर पूरा कर के इस दुनिया का,
    धुंधली हो गयी आरजूएं जो शायद कभी घनी नही थी!

    ========

    un aarzuoo ka dhundhlaa ho jana wo kabhi ghani nahi thi..
    jaise ruth jana us kismat ka jo kabhi meri nahi thi..

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  12. जमात में मेरे मरने पर रोने वालो की कमी नही थी,
    दफ़नाने मेरी मिटटी को किस्मत में दो गज ज़मी नही थी,
    ---------
    what a oxymoron....

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    बस अब चलते हैं सफर पूरा कर के इस दुनिया का,
    धुंधली हो गयी आरजूएं जो शायद कभी घनी नही थी!

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  13. गर इक बार तू जनाजे पे नज़र-ऐ-इनायत कर देती,
    ख्वाहिश पूरी हो जाती जो बर्फ नुमा जमी नही थी,

    बहुत बढ़िया!

    बाट तकते रहे, ख्वाब बुनते रहे,

    उनकी राहों से काँटे ही चुनते रहे,

    जान बिस्मिल हुई, फूल कातिल हुए।

    मेरी मय्यत में भी वो ना शामिल हुए।।

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