मंगलवार, 14 जुलाई 2009

क्या खोया क्या पाया.....

अक्सर कभी सोचता हूँ ज़िन्दगी में क्या खोया क्या पाया मैंने.....
दुनिया के बनाए हर रिश्ते को शिद्दत से निभाया मैंने.....
फिर भी इक कसक सी दिल में उठती है की कुछ तो नदारद है....
शायद सब कुछ पा के भी कुछ भी न पाया मैंने.....
चमकते थे रौशनी में पर मोम से बने थे रिश्ते.....
अक्सर जज्बातों की आग में पिघलने से बचाया मैंने......
सुना था वक्त का पहिया वक्त बदल देता है कभी भी...
उसी वक्त के हाथों ख़ुद को नाचता पाया मैंने.....
गर तेरा सजदा करता तो शायद जन्नत नसीब पाता....
झूठे नातों को निभाने में बेशकीमती पल गवाया मैंने.....

7 टिप्‍पणियां:

  1. चमकते थे रौशनी में पर मोम से बने थे रिश्ते.....
    अक्सर जज्बातों की आग में पिघलने से बचाया मैंने......

    wah kitna gahra likha hai bhav..sach kahka kitna dard hota hai najab riste pighlte hai kahin...
    aapki kalam kamal hai
    acha laga aapko padne ka mauka mila mujhe

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  2. Very beautiful & has a great depth!
    Keep writing..

    Regards,
    Dimple
    http://poemshub.blogspot.com

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  3. बहुत ही गहरी भाव के साथ लिखी हुई आपकी ये लाजवाब रचना बहुत अच्छी लगी!

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  4. "उसी वक्त के हाथों ख़ुद को नाचता पाया मैंने....."
    Indeed we are merely playthings, dancing to the tune with no control of ours. A brilliant creation!

    http://literarybonanza.blogspot.com/
    http://gurumehar.blogspot.com/

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  5. It is one of the best cuplet i have ever read... keep it up :)

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