सोमवार, 27 जुलाई 2009

शिल्पकार!!

कब से पलकें थी बिछायी इंतज़ार में
अब कहीं जा के दीदार ऐ यार होगा
फलक से क़दम तेरे ज़मी पे जब पड़ेंगे
दुल्हन की तरह इस धरती का श्रींगार होगा
इस्तकबाल में तेरे गली कूचा यूं सजेगा
चश्मदीदों के अरमां ये रूह-ऐ-रुखसार होगा
किसी अनजान राहगीर पे झलक न पड़ने देना
अपनी बदहवासी का वो ख़ुद जिम्मेदार होगा
तारीफ है उस खुदा की जिसने तुझे तराशा
सिर्फ़ हसीन मिट्टियों का वो शिल्पकार होगा

9 टिप्‍पणियां:

  1. "Sirf hasin mittion ka wo shilpkar hoga"......
    beautiful imagination.....
    :-)

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  2. किसी अनजान राहगीर पे झलक न पड़ने देना
    अपनी बदहवासी का वो ख़ुद जिम्मेदार होगा..khoobsurati ka khoobsurat warnan...

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  3. बहुत सुंदर लिखा है आपने! सबसे अलग सबसे जुदा और एक नए अंदाज़ के साथ ! बहुत बढ़िया लगा!

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  4. waah waah waah waah..........aur phir waah waah waah waah
    kya khoob likha hai.....wakai us shilpkar ke kya kahne aur aapki soch ke kya kahne.

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  5. wow ...haseen mittioyo ka shilpkaar !!!

    a new word for me....unique way of thinking !!

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